बुरहानपुर

संतो का सानिध्य एवं संतो की वाणी श्रवण मात्र से मानव भवसागर पार कर सकता है – श्री शास्त्री चिंतनप्रिय दासजी स्वामी

संतो का सानिध्य एवं संतो की वाणी श्रवण मात्र से मानव भवसागर पार कर सकता है – श्री शास्त्री चिंतनप्रिय दासजी स्वामी
बुरहानपुर नि.प्र. – समाज सेवा के क्षेत्र में जिले की अग्रणी संस्था जनजाग्रति संस्था बुरहानपुर द्वारा बुरहानपुर की धरा पर सीलमपूरा क्षेत्र में स्थित श्री स्वामी नारायण मंदिर में पुरुषोत्तम मास के अंतर्गत चल रही मासिक कथा के अवसर पर जनजाग्रति संस्था बुरहानपुर के संरक्षक एवं संस्थापक अध्यक्ष महेंद्र जैन ,संस्था अध्यक्ष डॉ किरण सिंह , संस्था सदस्य व् पूर्व अध्यक्ष कैलाश अग्रवाल, सदस्य देवचंद शर्मा , रविन्द्र महाजन , आर एस ठाकुर , विवेक हकीम द्वारा व्यासपीठ पर विराजमान वक्ता परमपूजनीय शास्त्री चिंतनप्रिय दासजी स्वामी,मंदिर के महंत प.पु. कोठारी पी पी स्वामी एवं मंदिर के वरिष्ठ संत परमपूज्य शाश्त्री चन्द्रप्रकाश दास जी का शाल , श्रीफल , हार एवं भेट से सम्मान किया गया l
पुरुषोतम मास के अंतर्गत चल रही कथा को संबोधित करते हुए श्री स्वामीनारायण मंदिर के व्यासपीठ के वक्ता शास्त्री चिंतनप्रिय दासजी स्वामी ने कहा की मानव जीवन बहुत पुन्य कर्मो के फल से प्राप्त होता है इस संसार में चोरासी लाख योनी है और 84 लाख योनी में मानव जीवन मिलना मोक्ष प्राप्त करने का द्वार है श्री स्वामी जी ने कहा की मानव को समझना होगा की संतो का सानिध्य एवं संतो की वाणी श्रवण मात्र से मानव भवसागर पार कर सकता है l समय है प्रत्येक मानव प्राणी मात्र के लिए की वह जीवन में सद्कार्य के साथ साथ प्रेमभाव व धर्म के प्रति अपनी आस्था रखते हुए जीवन भर धर्म कार्य करते रहे तब ही जाकर मानव को सुख शांति और वैभव प्राप्त होता है l इस अवसर पर मंदिर के मिडिया प्रभारी गोपाल देवकर ,हरिभक्त नटवर भगत ,हरिभक्त किशोर भाई शाह ,हरिभक्त अशोक जी शाह ,हरिभक्त रणछोड़ भाई शाह , हरिभक्त ठाकुर भाई के साथ साथ बड़ी संख्या में समाज के महिला एवं पुरुष उपस्थित थे l कार्यक्रम का सफल एवं सुंदर संचालन गोपाल देवकर ने किया l
सलग्न उक्त अवसर के छायाचित्र l

वक्ता श्री शास्त्री चिन्तनप्रियदासजी स्वामी
मंदिर के महंत श्री कोठारी पी पी स्वामी,
मंदिर के वरिष्ठ संत शास्त्री चंद्रप्रकाश दासजी
संतों के आगमन से ही जीवन होता है पावन : शास्त्री चिंतन प्रियदास जी
अधिक मास में गौसेवा, भक्ति और सत्संग से मिलता है अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य
बुरहानपुर – पावन पुरुषोत्तम मास के अवसर पर श्री स्वामीनारायण मंदिर सीलमपुर में आयोजित अधिक मास महात्म्य कथा में व्यासपीठ से कथा का रसपान कराते हुए शास्त्री चिंतन प्रियदास जी ने संत महिमा, गौसेवा, हरिनाम और भगवान भक्ति का महत्व विस्तार से बताया। कथा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।
शास्त्री जी ने कहा कि सनातन धर्म के सभी पुराणों और शास्त्रों में संतों को भगवान का स्वरूप माना गया है। जिस घर या गांव में संतों का आगमन होता है, वहां उसी दिन दशहरा और दीपावली जैसा पावन वातावरण बन जाता है। संतों के चरणों से ही मनुष्य के जीवन का उद्धार संभव होता है। उन्होंने कहा कि मनुष्य जीवन का सबसे बड़ा ध्येय संतों का आश्रय ग्रहण करना होना चाहिए। श्रीमद्भागवत और रामचरितमानस का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि भगवान की कृपा संतों के माध्यम से ही प्राप्त होती है। कथा के दौरान उन्होंने सेवा के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यदि कोई व्यक्ति धन से सेवा नहीं कर सकता, तो वह तन और मन से भी सेवा कर सकता है। निष्काम भाव से की गई सेवा भगवान को अत्यंत प्रिय होती है। अधिक मास की महिमा बताते हुए शास्त्री जी ने कहा कि शास्त्रों में वर्णित है कि पुरुषोत्तम मास में गौमाता की सात बार परिक्रमा करने से एक अश्वमेध यज्ञ के बराबर पुण्य प्राप्त होता है। वहीं श्रद्धा और सेवा भाव से गौसेवा करने पर बड़े से बड़े कष्ट और भयावह रोगों से भी मुक्ति मिल सकती है। उन्होंने कहा कि मनुष्य जीवन पानी के बुलबुले के समान क्षणभंगुर है, इसलिए इसे भगवान की भक्ति और सत्कर्मों में लगाना चाहिए। अंत समय में यदि मनुष्य भगवान का नाम ले लेता है, तो उसका जीवन सफल हो जाता है। शास्त्री चिंतन प्रियदास जी ने कहा कि भगवान की भक्ति निष्काम भाव से होनी चाहिए। भक्ति कभी स्वार्थ के लिए नहीं, बल्कि आत्मा की शांति और परमात्मा की प्राप्ति के लिए की जानी चाहिए। कथा में उन्होंने “चिंता” और “चिंतन” का अंतर समझाते हुए कहा कि यदि मनुष्य चिंता छोड़कर भगवान का चिंतन करे, तो जीवन के दुख स्वतः समाप्त होने लगते हैं। उन्होंने भक्ति की तुलना एनेस्थेशिया से करते हुए कहा कि जिस प्रकार एनेस्थेशिया लगने के बाद शरीर को दर्द का अनुभव नहीं होता, उसी प्रकार भगवान का भजन और हरिनाम भी जीवन के दुखों का एहसास कम कर देता है।
उन्होंने कहा कि मनुष्य को अपने जीवन में हरिनाम का “एनेस्थेशिया” लगा लेना चाहिए, क्योंकि जब मन भगवान के नाम और भजन में रम जाता है, तब दुखों का प्रभाव कम हो जाता है और जीवन में सुख, शांति और आनंद बढ़ने लगता है। कथा के अंत में श्रद्धालुओं से पुरुषोत्तम मास में अधिक से अधिक भजन, सत्संग, गौसेवा और दान-पुण्य करने का आह्वान किया गया। समापन पर भक्तों ने भक्ति भाव से भगवान का कीर्तन और आरती की।
मंदिर के मीडिया प्रभारी गोपाल देवकर हरिभक्त नटवर भगत हरिभक्त किशोर भाई शाह,हरिभक्त अशोक जी शाह ,हरिभक्त रणछोड़ भाई शाह,हरिभक्त ठाकुर भाई इत्यादि हरिभक्त महिला व पूरुष मौजूद रहे

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